वाह! क्या गजब की व्यवस्था है। राजस्थान के चिकित्सा जगत में आजकल एक नया 'वायरस' आया है, जिसका नाम है— MedLEaPR पोर्टल। अब तक डॉक्टर साहब मरीज की नब्ज टटोलते थे, अब वे 'सर्वर डाउन' की नब्ज टटोलेंगे।
'बड़े बाबुओं' ने एयरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर यह क्रांतिकारी फैसला लिया कि डॉक्टर अब सिर्फ डॉक्टर नहीं, बल्कि 'सुपर-फास्ट डेटा एंट्री ऑपरेटर' भी बनेंगे। उन्हें लगा होगा कि एक सर्जन जो महीन नसों का ऑपरेशन कर सकता है, वो पोर्टल पर 'कैप्चा' कोड तो चुटकियों में भर ही देगा।
कम्प्यूटर ऑपरेटर देना तो दूर की बात है, साहब ने तो सीधे फरमान सुना दिया— "या तो ऑनलाइन MLC बनाओ, या फिर चार्जशीट खाओ"।
इधर हमारे 'बड़े डॉक्टर बाबू साहब' ने भी कम फुर्ती नहीं दिखाई। आदेश मिलते ही उन्होंने अपनी कुर्सी के चारों ओर सुरक्षा की ऐसी 'डिजिटल दीवार' खड़ी की कि बड़े-बड़े इंजीनियर भी शर्मा जाएं। उन्होंने तुरंत एक 'शपथ पत्र' तैयार कर दिया। मतलब साफ है— "हुजूर, मैंने तो सबको डरा दिया है, अब अगर पोर्टल न चले या डॉक्टर का सर्वर फेल हो जाए, तो इसमें मेरी कुर्सी का कोई दोष नहीं।"
- तकनीकी ज्ञान? "वो आप खुद सीखिए।"
- इंटरनेट की स्पीड? "वो भगवान भरोसे।"
- कम्प्यूटर ऑपरेटर? "वो हम देंगे नहीं।"
- जिम्मेदारी? "वो शत-प्रतिशत आपकी!"
अब तो आलम यह है कि अस्पताल में डॉक्टर मरीज को देखकर यह नहीं पूछता कि "कहाँ दर्द है?", बल्कि यह सोचता है कि "MLC का पासवर्ड क्या था?"। चिकित्सा अधिकारियों से प्रमाण पत्र मांगकर निदेशालय ने यह तो सुनिश्चित कर लिया कि कागजों पर सब 'डिजिटल' हो गया है, भले ही धरातल पर डॉक्टर साहब 'कंट्रोल+एस' (Ctrl+S) दबाते-दबाते खुद ही 'हॉट-स्पॉट' बन जाएं।
यह व्यवस्था की वह विडंबना है जहाँ 'कुर्सी' बचाने के लिए 'शपथ पत्र' लिए जाते हैं, और काम निकालने के लिए 'जबरदस्ती' की जाती है।
